
भारतीय शिक्षा संस्कृति के सजग संदेशवाहक थे डाॅ सर्वपल्ली राधाकृष्णन – मुरारी यादव

गडहनी/भोजपुर
भोजपुर जिले के गडहनी प्रखण्ड अन्तर्गत उत्क्रमित मध्य विद्यालय चइंयाचक मे राष्ट्रपति डॉक्टर राधाकृष्ण सर्वपल्ली की जयन्ती धूमधाम से मनाई गई।इस अवसर पर उनके छायाचित्र पर फूल माला अर्पण करते हुए प्रधानाध्यापक मुरारी यादव ने उनके जीवनी पर प्रकाश डालते हुए कहा कि तमिलनाडु के सटे एक स्थान है तिरुट्टनी एक ब्राह्मण दंपति यहीं अपना गांव छोड आजीविका के लिए आकर बस गया।उनका नाम विरासमियाह था उनकी धर्मपत्नी थी सीताम्मा।उस समय जीवन यापन करना बडा कठिन काम था।संयोग बस एक रईस घर में राजस्व कर्मचारी के पद पर विरासमियाह को नौकरी मिल गई। यही पर पांच सितंबर अठारह सौ अठ्ठासी में एक बालक का जन्म हुआ।नाम पडा राधाकृष्णन।
राधाकृष्णन का परिवार मूलरूप से तमिलनाडु के सर्वपल्ली गांव का वासी था।गांव में जीवन निर्वाह का कुछ यथोचित साधन नहीं था।इसलिए गांव वाले दूसरे गांव में प्रतिस्थापित होते गये पर अपने गांव के प्रति समर्पित भावना को वे न त्याग सके।वे अपने नाम के पूर्व अपने गांव के नाम का उल्लेख करने लगे।बालक राधाकृष्णन के साथ भी ऐसा रहा सर्वपल्ली राधाकृष्णन।सर्वपल्ली राधाकृष्णन बचपन से हीं प्रतिभावान और मेधावी थे।प्रारंभिक शिक्षा घर पर हुई।वे सनातनी हिन्दू ब्राह्मण परिवार था।फलतः धर्म, दर्शन और अध्यात्म का परिवेश स्वमेव मिलता रहा।जो उतरोत्तर बढता हीं रहा।सन अठारह सौ छेयानवे से लेकर उन्नीस तक वे लुथर्न मिशन स्कूल के छात्र रहे।इसी उन्नीस सौ से उन्नीस स चार तक वेल्लूर में अध्ययन किये।इसी समय इनकी शादी सीताम्मा से हो गई।उच्च शिक्षा मद्रास क्रिश्चियन कालेज मद्रास से किया बाद के दिनों में वे यही पर दर्शन शास्त्र के प्राध्यापक बने।व्यवहार में सहजता और वाणी में सरलता थी जबकि वतृत्व में प्रगाढ़ता थी।भारतीय धर्म,दर्शन, अध्यात्म की शिक्षा वे आजन्म देते रहे।शिक्षा से इनका जुडाव सहज तौर पर रहा।सन उन्नीस सौ एकतीस से छत्तीस तक आंध्र विश्वविद्यालय के चांसलर रहे।छत्तीस से एकतालीस तकजार्ज पंचम कालेज कलकत्ता में व्याख्याता रहे।एकतालीस से बावन तक औक्सफोर्ड विश्वविद्यालय में अपनी सेवा दिये।इसी समय उनचालीस से अडतालीस तक काशी हिंदू विश्वविद्यालय के कुलपति रहे।तीरपन से बासठ तक दिल्ली विश्वविद्यालय के भी कुलपति तथा भारतीय गणराज्य के राष्ट्रपति भी रहे।ऐसे महान विभूति ने जीवन पर्यंत शिक्षा मे योगदान देते रहे।राष्ट्र निर्माण में भी इनकी भूमिका अग्रगण्य रही।इनके अविस्मरणीय योगदान को देखते हुए।भारत सरकार ने इन्हें ‘भारत रत्न’ से सम्मानित किया।ये सुयोग्य शिक्षक, कुशल प्रशासक, प्रगाढ़ दार्शनिक, अपूर्व विचारक थे।
आज भी हमसब इनके जन्म दिवस को शिक्षक दिवस के रूप में मनाते है।ऐसे दिव्य गुण संपन्न महामानव ने सतरह अप्रैल उन्नीस सौ पचहत्तर में चेन्नई में अंतिम सांस लिया।इसतरह भारतीय शिक्षा, संस्कृति और संवाद के संवाहक महापुरुष सर्वपल्ली राधाकृष्णन देश दुनियां से विदा लिये।ये देश उनका ऋणी है।मौके पर बैजन्ती देवी, पुरकान अहमद, अशोक कुमार सिंह, रमन कुमार सैनिक, कुमारी अभिलाषा, लाडली परवीन, मुखिया प्रतिनिधि संजय चौधरी, महताब आलम सहित विद्यालय के छात्र छात्राएं उपस्थित थे।



